Dost ke Behan Ke Sath Sex: होटल का सिंगल बेड Part 4

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Dost ke Behan Ke Sath Sex: सुबह की नरम धूप कमरे में फैल चुकी थी। प्रीति मेरी बाँहों में पूरी तरह समाई हुई सो रही थी। कल रात की जोरदार चुदाई के निशान उसके शरीर पर अभी भी ताजा थे — गर्दन पर हल्के सुर्ख निशान, छातियों पर मेरे दाँतों के हल्के दाग, जाँघों के बीच हल्की सूजन और योनि पर सूखा वीर्य। उसकी एक टाँग मेरी टाँग पर पड़ी हुई थी और उसकी गर्म, नम योनि मेरी जाँघ से सटी हुई थी।

मैंने धीरे से उसके बालों में उँगलियाँ फेरीं। प्रीति कराहती हुई जागी। आँखें खोलकर पहले शरमाई, फिर मुस्कुराई। “जान… आज आखिरी दिन है ना?”

“हाँ,” मैंने उसके माथे को चूमते हुए कहा, “आज पूरा दिन सिर्फ हमारा है। कोई जल्दबाजी नहीं।”

प्रीति ने खुद को मेरे सीने से और कसकर चिपका लिया। उसके निप्पल मेरी छाती से रगड़ खा रहे थे। मैंने उसके नितंबों को दोनों हाथों में भर लिया और जोर से मसलने लगा। मेरी उँगलियाँ उसकी गाँड की दरार में सरक गईं। प्रीति सिहर उठी और मेरी गर्दन पर हल्का काट लिया।

“जान… मुझे फिर से चोदो… लेकिन आज बहुत धीरे-धीरे…”

हम काफी देर तक ऐसे ही लेटे रहे — चूमते, सहलाते, रगड़ते। मेरा लिंग पहले ही उसकी जाँघों के बीच फँसा हुआ था और गीला हो चुका था।

करीब ४० मिनट बाद मैं उठा और होटल वाले से तेल की बोतल मँगवाई। प्रीति को पेट के बल लिटाया। उसका गोल-गोल नितंब ऊपर था। मैंने तेल की बोतल खोली और पहले उसके कंधों, पीठ और कमर पर भरपूर तेल डाला। फिर दोनों हाथों से धीरे-धीरे मालिश शुरू की।

“उफ्फ… जान… कितना अच्छा लग रहा है…” प्रीति आहें भर रही थी।

मैं नीचे आया। उसके दोनों गोल नितंबों पर तेल डाला और जोर से मसलने लगा। उँगलियों से नितंबों को अलग किया और बीच की गाँड की दरार पर तेल डालकर उँगली घुमाने लगा। प्रीति की कमर उठने लगी।

“आह… वहाँ… उँगली डालो ना…”

मैंने अपनी तर्जनी पर तेल लगाकर धीरे से उसके गाँड के छेद में डाल दी। प्रीति काँप उठी। मैंने बहुत धीरे-धीरे अंदर-बाहर करना शुरू किया। दूसरी उँगली से उसकी योनि में भी तेल डालकर सहलाने लगा। दोनों छेदों में उँगलियाँ चलाते हुए मैंने उसे पूरी तरह तड़पा दिया।

“जान… मैं मर जाऊँगी… अब लिंग डाल दो…”

मैंने उसे चित किया। अब उसकी योनि पूरी तरह तेल से चमक रही थी। मैंने अपने लिंग पर भी तेल लगाया और धीरे-धीरे पूरा अंदर कर दिया। तेल की वजह से बहुत आसानी से घुस गया। फिर मैंने लंबी-लंबी, धीमी-धीमी ठोकरें मारनी शुरू कीं। हर ठोके पर प्रीति की सिसकारी निकल रही थी।

“जोर से… जान… फाड़ दो मेरी चूत को…”

मैंने उसकी टाँगें अपने कंधों पर रख दीं और गहराई से चोदने लगा। तेल की वजह से चप-चप की आवाज और तेज हो रही थी। प्रीति के छोटे उरोज हिल रहे थे। मैंने एक को मुंह में ले लिया और चूसते हुए चोदता रहा।

इसके बाद हमने पोजीशन बदली। प्रीति ऊपर आई। वो मेरे लिंग पर बैठी और अपनी कमर हिलाने लगी। मैंने उसके नितंब पकड़कर नीचे से जोर-जोर से ठोके मारे। उसके उरोज मेरे मुँह के सामने थे, मैं उन्हें चूसता और काटता रहा।

दोपहर में हम बनारस घूमने निकले। लेकिन बीच-बीच में मौका मिलते ही हम छुपकर मिलन करते रहे। एक पुरानी मंदिर की पिछली गली में मैंने उसे दीवार से सटाकर खड़े-खड़े चोदा। स्कर्ट ऊपर करके, पैंटी एक तरफ सरकाकर, तेज-तेज झटके मारे। प्रीति ने मुँह पर हाथ रखकर अपनी चीख दबाई।

शाम को होटल लौटकर हमने फिर तेल मालिश की। इस बार मैंने उसे चारों खाने चित करके, उसके दोनों पैर कंधों पर रखकर इतना गहरा और जोर से चोदा कि प्रीति रो पड़ी।

“जान… फाड़ दो… मेरी चूत फाड़ दो… भर दो अंदर… अपना सारा वीर्य…”

मैंने आखिरी जोरदार झटकों के साथ पूरा गर्म वीर्य उसके गर्भाशय में उड़ेल दिया। प्रीति का पूरा बदन ऑर्गेज्म से काँप रहा था। उसकी योनि मेरे लिंग को बार-बार दबा रही थी।

हम दोनों थककर लेट गए। प्रीति मेरी छाती पर सिर रखे हुए थी। उसकी योनि से मेरा वीर्य रिस-रिसकर बाहर निकल रहा था और चादर पर गिर रहा था।

“कल घर जाना है…” उसने धीरे से कहा, “लेकिन मैं तुम्हें छोड़कर कैसे रहूँगी?”

मैंने उसके नितंब पर थपकी दी और बोला, “घर जाकर भी हम मौका ढूंढेंगे। तू अब मेरी है… दोस्त की बहन नहीं, मेरी जान है।”

रात अभी बहुत लंबी थी। हम फिर से एक-दूसरे में घुलने वाले थे…

Dost ke Behan Ke Sath Sex: होटल का सिंगल बेड Part 3

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