Dost ke Behan Ke Sath Sex: ट्रेन शाम को छूटनी थी, लेकिन बनारस घाट पर बैठे-बैठे प्रीति ने अचानक मेरी बाँह पकड़ ली। उसकी आँखों में शरारत और वासना दोनों थीं। “अमित भैया… घर अभी नहीं चलना है ना? परीक्षा तो मिस हो ही गई… दो-चार दिन और रुक जाते हैं। कोई बहाना बना लेंगे।”
मैंने उसे देखा। कल रात की चुदाई के बाद उसका चेहरा और निखर गया था। होंठ थोड़े सूजे हुए, गालों पर हल्की लाली। मैंने फुसफुसाकर कहा, “क्या बहाना बनाएँ?”
“बोल देंगे कि अगला पेपर दो दिन बाद है। या ट्रेन मिस हो गई। घर पर फोन करके कह देंगे कि सब ठीक है, दो-तीन दिन और लगेंगे।” उसने मेरी जाँघ पर हाथ फेरा और धीरे से दबाया। “मुझे और तुम्हारे साथ रहना है… बहुत दिन तक।”
मेरा लिंग तुरंत सख्त हो गया। हम तुरंत होटल वापस लौट आए। मैनेजर से कहा कि दो दिन और रुकना है। उसने बिना सवाल पूछे कमरा एक्सटेंड कर दिया। अब हम दोनों के पास पूरा समय था — बिना किसी डर के।
कमरे में घुसते ही प्रीति ने खुद को मेरे गले से लिपटा लिया। “जान… अब मुझे फिर से वही करो… जो कल रात किया था।” उसकी साँस गर्म थी। मैंने उसे दीवार से सटा दिया और जोर से चूम लिया। हमारे होंठ एक-दूसरे को चूस रहे थे, जीभें लड़ रही थीं। मैंने उसकी सलवार की नाड़ी खींची, वो खुद ही कमीज उतार रही थी।
दो मिनट में हम दोनों नंगे हो चुके थे। प्रीति की छोटी-छोटी छातियाँ, गोल नितंब, और हल्के बालों वाली योनि कमरे की रोशनी में चमक रही थीं। मैंने उसे बेड पर लिटाया और उसके पैरों के बीच घुटनों के बल बैठ गया।
“आज मैं तुम्हें पूरा चखना चाहता हूँ,” मैंने कहा और उसके पैरों को चौड़ा किया। उसकी योनि पहले से ही गीली हो चुकी थी। मैंने जीभ से पूरी लकीर चाटी। प्रीति सिहर उठी। “आह… जान… बहुत अच्छा लग रहा है…”
मैंने उसकी योनि को पूरी तरह मुंह में ले लिया। जीभ अंदर डालकर चक्कर काटने लगा, क्लिटोरिस को हल्का-हल्का काटा, चूसा। प्रीति की कमर उठ-उठकर मेरे मुँह से टकरा रही थी। उसके हाथ मेरे बालों में थे। “और तेज… चूसो ना… उफ्फ… अंदर… जीभ डालो ना…”
कुछ ही मिनटों में वो पहली बार झड़ गई। गर्म रस मेरे मुँह में भर गया। मैंने सब पी लिया।
अब मैं खुद को रोक नहीं पा रहा था। मैंने अपना पजामा उतारा। मेरा लिंग लोहे की तरह सख्त था। प्रीति ने उसे देखा और शरमाकर आँखें बंद कर लीं। मैं उसके ऊपर लेट गया। लिंग की नोक को उसकी योनि पर रखा और धीरे-धीरे दबाव डाला।
“धीरे… जान… अभी भी दर्द होता है…” वो बोली।
मैंने बहुत धीरे किया। इंच-इंच करके अंदर घुसता गया। उसकी योनि बहुत तंग थी, लेकिन गीली होने की वजह से आसानी हो रही थी। आधा घुसने के बाद उसने कराहते हुए कहा, “रुकिए… थोड़ा रुकिए…”
मैं रुक गया और उसके होंठ चूमने लगा। धीरे-धीरे उसका शरीर ढीला पड़ने लगा। फिर मैंने बाकी का हिस्सा भी अंदर कर दिया। पूरी तरह अंदर घुसने पर प्रीति ने लंबी आह भरी।
“अब… पूरा… अंदर है ना?” उसने पूछा।
“हाँ बेबी… पूरा,” मैंने कहा और धीरे-धीरे हिलने लगा।
शुरू में धीरे, फिर तेज। हर झटके के साथ प्रीति की सिसकारियाँ बढ़ती गईं। “जोर से… जान… और जोर से…” वो चिल्लाई।
मैंने उसकी टाँगें अपने कंधों पर रख दीं और तेजी से चोदने लगा। कमरे में चप-चप की आवाज़ गूँज रही थी। उसकी योनि मेरे लिंग को कसकर जकड़े हुए थी। कुछ देर बाद वो फिर झड़ गई — इस बार बहुत जोर से। उसके अंदर की दीवारें मेरे लिंग को दबाने लगीं।
मैं भी अब किनारे पर था। “प्रीति… मैं आने वाला हूँ…”
“अंदर… मत निकालना… अंदर ही डाल दो…” उसने कहा।
मैंने आखिरी जोरदार झटके मारे और पूरा वीर्य उसके अंदर उड़ेल दिया। गर्म-गर्म लावा उसके गर्भाशय तक पहुँच रहा था। हम दोनों थककर एक-दूसरे से लिपटे पड़े रहे।
काफी देर बाद प्रीति बोली, “जान… अब हम क्या करेंगे? कल परीक्षा मिस हो गई… घर जाकर क्या कहेंगे?”
मैंने उसके बालों में हाथ फेरते हुए कहा, “चिंता मत करो। हम कह देंगे कि ट्रेन लेट थी या कुछ और। लेकिन अब ये रिश्ता… हम छुपाकर रखेंगे। जब भी मौका मिलेगा, हम ऐसे ही साथ होंगे।”
वो मुस्कुराई और मेरे सीने पर सिर रख दिया।
शाम को हम बनारस घूमने निकले। लेकिन अब हमारा रिश्ता पहले से कहीं ज्यादा खुला हो चुका था। घाट पर भीड़ के बीच मैंने उसकी स्कर्ट के अंदर हाथ डालकर उसकी योनि सहलाई। प्रीति मेरी बाँह को कसकर पकड़े हुए थी और दाँतों से होंठ काट रही थी। “यहाँ मत… लोग देख लेंगे…” लेकिन उसकी जाँघें थोड़ी फैल गई थीं।
रात को होटल वापस आने के बाद हमने फिर से शुरू किया। इस बार प्रीति ऊपर थी। वो मेरे लिंग पर बैठी और धीरे-धीरे ऊपर-नीचे होने लगी। उसके छोटे उरोज हिल रहे थे। मैंने उन्हें दबाते हुए कहा, “तुम बहुत सुंदर हो… मेरी जान।”
वो झुककर मुझे चूमने लगी। उसकी कमर तेजी से हिल रही थी। “मुझे और चाहिए… रात भर… सोने नहीं दोगे ना?”
हम रात भर जागे रहे। तीन बार चोदा उसे। एक बार तो बाथरूम में खड़े-खड़े, एक बार खिड़की के पास खड़े होकर पीछे से। हर बार वो नई-नई सिसकारियाँ निकाल रही थी। सुबह जब नींद खुली तो वो मेरी बाँहों में लिपटी हुई थी। उसकी जाँघों के बीच सूखा वीर्य और उसका रस लगा हुआ था।
“जान… आज पूरे दिन क्या करेंगे?” उसने आँखें मलते हुए पूछा।
“आज हम कहीं बाहर घूमने जाएँगे… लेकिन बीच-बीच में… जहाँ मौका मिले…” मैंने उसके नितंब पर थपकी दी।
हम अस्सी घाट गए। वहाँ एक पुरानी हवेली के पास कम भीड़ थी। हमने एक सुनसान कोने में जगह ढूँढ ली। प्रीति मेरी गोद में बैठ गई। मैंने उसकी स्कर्ट ऊपर की और पैंटी एक तरफ सरकाकर लिंग अंदर डाल दिया। वो मेरी गोद में ऊपर-नीचे होने लगी। धीरे-धीरे, चुपचाप, लेकिन गहरी चुदाई। पास से लोग गुजर रहे थे, लेकिन हमें परवाह नहीं थी।
“लोग देख लेंगे तो…” वो फुसफुसाई, लेकिन अपनी कमर नहीं रोकी।
“देखने दो… तू मेरी है,” मैंने उसके कान में कहा और नीचे से जोर से ठोका।
वो वहीं मेरी गोद में झड़ गई। मैंने भी अंदर ही छोड़ दिया।
दोपहर में हम एक सस्ते रेस्टोरेंट में गए। वहाँ भी पीछे वाले टेबल पर बैठकर मैंने उसके पैरों के बीच उँगली डालकर खेला। शाम को होटल लौटकर फिर पूरी रात मस्ती। इस बार मैंने उसे चारों खाने चित करके, उसके दोनों पैर कंधों पर रखकर इतना जोर से चोदा कि वो रो पड़ी आनंद से।
“जान… मैं मर जाऊँगी… लेकिन मत रुको…”
तीन दिन ऐसे ही बीत गए। हर दिन नई जगह, नई मुद्रा, नई गहराई। चौथे दिन प्रीति बोली, “अब एक दिन और… फिर घर चलेंगे। लेकिन घर जाकर भी हम छुप-छुपकर मिलेंगे ना?”
मैंने उसे चूम लिया। “हाँ… हमेशा। तू अब मेरी है।”