Dost ke Behan Ke Sath Sex: सुबह की रोशनी कमरे में आते ही प्रीति मेरी छाती पर सिर रखे लेटी थी। उसकी योनि अभी भी मेरे वीर्य से चिपचिपी थी। कल रात की आखिरी चुदाई के बाद हम दोनों थके हुए थे, लेकिन आज आखिरी दिन था। कल सुबह हम घर के लिए निकलने वाले थे।
प्रीति ने आँखें खोलीं और मेरी तरफ देखकर मुस्कुराई। “जान… आज आखिरी दिन है। मुझे इतना चोदो कि याद रहे महीनों तक।”
मैंने उसे चूम लिया और बोला, “आज रात भर तुझे आराम नहीं आने दूँगा।”
मैं उठा और फिर से तेल की बोतल ली। प्रीति को पेट के बल लिटाया। उसके गोल-गोल नितंब ऊपर थे। मैंने भरपूर तेल डाला और दोनों हाथों से मसलने लगा। उँगलियाँ नितंबों की दरार में घुस रही थीं। मैंने एक उँगली उसके गाँड के छेद में डाली और धीरे-धीरे घुमाने लगा। दूसरी उँगलियाँ उसकी योनि में। प्रीति तकिए को काट रही थी।
“आह… जान… दोनों जगह… उफ्फ… बहुत मजा आ रहा है…”
मैंने काफी देर तक उँगलियाँ चलाईं। फिर उसे चित किया और अपने तेल लगे लिंग को उसकी योनि पर रखा। एक ही झटके में पूरा अंदर कर दिया। तेल की वजह से बहुत आसानी से घुस गया। मैंने उसकी टाँगें अपने कंधों पर रखीं और जोर-जोर से चोदने लगा। हर झटके पर उसके छोटे उरोज हिल रहे थे।
“जोर से… अमित… फाड़ दो मेरी चूत… आज आखिरी दिन है… जितना मन करे चोदो…”
मैंने रफ्तार बढ़ा दी। कमरे में चप-चप… पच-पच की तेज आवाज गूँज रही थी। प्रीति के नाखून मेरी पीठ पर गहरे निशान बना रहे थे। वो दो बार झड़ गई। तीसरी बार जब वो झड़ी तो मैंने भी अपना पूरा गर्म वीर्य उसके अंदर उड़ेल दिया।
दोपहर में हम बाहर निकले। लेकिन हर जगह हम छुप-छुपकर मिलन कर रहे थे। घाट पर एक सुनसान कोने में प्रीति मेरी गोद में बैठकर चुद रही थी। स्कर्ट ऊपर, पैंटी एक तरफ सरकाकर। लोग पास से गुजर रहे थे, लेकिन हमें परवाह नहीं थी। वो मेरी गर्दन में मुँह छुपाए हुए धीरे-धीरे ऊपर-नीचे हो रही थी।
“जान… लोग देख लेंगे… लेकिन रुक मत… अंदर ही डाल देना…”
मैंने उसके नितंब पकड़कर नीचे से जोर से ठोके मारे और अंदर ही छोड़ दिया।
शाम को होटल लौटकर हमने कमरे की सारी बत्तियाँ जला रखीं। आज आखिरी रात थी। प्रीति ने खुद को पूरी तरह नंगा किया और मेरे सामने घुटनों के बल बैठ गई। उसने मेरे लिंग को मुंह में लिया और पूरी ताकत से चूसने लगी। जीभ नसों पर घुमा रही थी, अंडकोष चूस रही थी। मैं उसके बाल पकड़े हुए था।
फिर मैंने उसे बेड पर लिटाया और उसके पैर फैलाकर योनि को घंटों चाटा। जीभ अंदर डालकर चक्कर काट रहा था। प्रीति पागल हो रही थी। “जान… अब मत सताओ… लिंग डाल दो… फाड़ दो मुझे…”
मैं उसके ऊपर चढ़ा। इस बार मैंने उसे कुत्ते की मुद्रा में लिया। पीछे से लिंग अंदर डाला और जोर-जोर से चोदने लगा। उसके नितंब मेरे पेट से टकरा रहे थे। मैंने उसके बाल पकड़ लिए और तेजी बढ़ा दी।
“फाड़ दो… मेरी चूत फाड़ दो… जान… मैं तुम्हारी रंडी हूँ… हमेशा…”
मैंने उसे कई पोजीशन में चोदा — मिशनरी, साइड, फिर वो ऊपर, फिर स्टैंडिंग। रात के दो बजे तक हम लगातार चुदाई कर रहे थे। आखिरी राउंड में प्रीति मेरी गोद में बैठी हुई थी। उसके उरोज मेरे मुंह में थे। वो तेजी से ऊपर-नीचे हो रही थी।
“जान… मैं आ रही हूँ… साथ में आओ…”
हम दोनों साथ ही झड़ गए। मैंने आखिरी बार पूरा वीर्य उसके अंदर भर दिया। प्रीति मेरी छाती पर ढेर हो गई।
काफी देर तक हम ऐसे ही लिपटे रहे। प्रीति की आँखों में आँसू थे। “अमित… घर जाकर हम कैसे रहेंगे? मैं तुम्हें छोड़कर कैसे सोऊँगी?”
मैंने उसके बालों को सहलाते हुए कहा, “हम छुप-छुपकर मिलेंगे। जब भी राकेश बाहर जाएगा, तू मुझे बुलाना। या मैं आ जाऊँगा। ये रिश्ता कभी खत्म नहीं होगा। तू अब मेरी है।”
प्रीति ने मेरे होंठ चूमे और बोली, “मैं हमेशा तुम्हारी रहूँगी… दोस्त की बहन नहीं, तुम्हारी जान हूँ।”
सुबह हम तैयार हुए। ट्रेन पकड़ने से पहले प्रीति ने आखिरी बार मेरे लिंग को पकड़कर कहा, “जल्दी से फिर मिलना… मेरी चूत तुम्हारा इंतजार करेगी।”
हम दोनों होटल से निकले। बाहर सूरज चमक रहा था। हम भाई-बहन की तरह ट्रेन में बैठे, लेकिन अंदर से हम प्रेमी बन चुके थे।
कहानी समाप्त