Dost ke Behan Ke Sath Sex: रात का सन्नाटा कमरे में भर गया था। बाहर होटल के गलियारे में कभी-कभी कोई परीक्षार्थी खाँसता या बाथरूम की तरफ जाता सुनाई देता, लेकिन कमरा १०७ में सिर्फ हम दोनों की साँसें और दिलों की धड़कनें गूँज रही थीं। प्रीति की पीठ मेरी छाती से सटी हुई थी। उसकी सलवार और मेरे पजामे के बीच मेरा सख्त, नंगा लिंग उसके नितंबों की गहरी खाई में दब रहा था। मैंने हल्का सा दबाव बढ़ाया। उसकी गर्मी मेरे लिंग में समा गई।
उसके नितंब थोड़े से हिले। एक हल्का सा संकुचन। जैसे वो सोते-सोते भी मेरी उपस्थिति महसूस कर रही हो। मेरे हाथ ने उसकी जाँघ पर रखा हुआ दबाव बढ़ाया। उँगलियाँ धीरे-धीरे ऊपर सरकने लगीं। सलवार की पतली कपड़े के ऊपर से ही उसके नितंब की नरमाई महसूस हो रही थी। मैंने अपनी हथेली पूरे नितंब पर फैला दी और धीरे से मसला। प्रीति की साँस एक पल के लिए रुक गई, फिर तेज हो गई।
“अमित भैया…” उसकी आवाज बेहद धीमी, लगभग फुसफुसाहट थी। वो जाग चुकी थी। लेकिन करवट नहीं बदली।
मेरा दिल उछल पड़ा। डर और उत्तेजना का मिश्रण। मैंने उसके कान के पास मुँह ले जाकर फुसफुसाया, “प्रीति… अगर नहीं करना है तो बोल दो… मैं रुक जाऊँगा।”
उसने कुछ नहीं कहा। सिर्फ अपने नितंब पीछे की तरफ दबा दिए। मेरा लिंग और गहराई में दब गया। उसकी खाई की गरमाई ने मेरे लिंग को जकड़ लिया। ये सहमति थी। चुपचाप, शर्मीली, लेकिन स्पष्ट सहमति।
मेरी हिम्मत बढ़ गई। मैंने अपना हाथ आगे बढ़ाया और सलवार की नाड़ी पकड़ ली। धीरे-धीरे खींची। सलवार उसके गोल नितंबों पर से फिसलकर जाँघों तक आ गई। अब सिर्फ नीली पैंटी बची थी, जो पहले से ही गीली हो चुकी थी। मैंने पैंटी के किनारे से उँगली डाली और उसे भी नीचे सरकाने लगा। प्रीति ने अपने नितंब ऊपर उठा दिए ताकि मैं आसानी से उतार सकूँ।
पैंटी पूरी तरह उतर गई। अब उसका निचला हिस्सा पूरी तरह नंगा था। मैंने अपनी उँगलियों से उसके नितंबों को अलग किया। बीच में वो गर्म, नरम, थोड़ी नम दरार दिखी। हल्के-हल्के बालों वाली। मैंने एक उँगली वहाँ रखी। प्रीति सिहर उठी। उसकी योनि पहले से ही गीली थी। गुनगुना, चिपचिपा रस मेरी उँगली पर लग गया।
“उफ्फ… अमित भैया…” वो कराह उठी।
मैंने उँगली धीरे-धीरे अंदर-बाहर करने लगी। उसकी योनि बहुत तंग थी। अंदर की दीवारें मेरी उँगली को चूस रही थीं। प्रीति अब पूरी तरह जाग चुकी थी। उसने एक हाथ पीछे किया और मेरे लिंग को पकड़ लिया। पहली बार किसी लड़की का हाथ मेरे लिंग पर। उसकी छोटी-छोटी उँगलियाँ काँप रही थीं, लेकिन उसने धीरे-धीरे ऊपर-नीचे करना शुरू कर दिया।
मैं पागल हो रहा था। मैंने उसे चित कर दिया। अब वो मेरी तरफ मुँह करके लेटी थी। उसकी आँखें बंद थीं। चेहरा शर्म से लाल। मैंने उसकी कमीज के बटन खोलने शुरू किए। एक-एक करके। जब आखिरी बटन खुला तो उसकी छोटी-छोटी छातियाँ, बिना ब्रा के, हल्के से उभरी हुईं, सामने थीं। गुलाबी-गुलाबी चूचियाँ, छोटी लेकिन सख्त। मैंने एक को मुट्ठी में भर लिया और धीरे से दबाया।
प्रीति की सिसकारी निकल गई। “आह… धीरे… भैया…”
मैं झुककर उसकी एक चूची मुंह में ले लिया। जीभ से चाटा, हल्का-हल्का काटा। दूसरी छाती पर उँगलियाँ फेरता रहा। प्रीति अब दोनों हाथों से मेरे सिर को अपनी छाती से दबा रही थी। उसका बदन तप रहा था। मैंने नीचे अपना मुँह ले जाया। उसकी नाभि चूमी, फिर नीचे।
जब मेरा मुँह उसकी योनि के पास पहुँचा तो उसकी खुशबू — युवा लड़की की, पसीने की और उत्तेजना की — मेरे सिर में चढ़ गई। मैंने पहली बार जीभ से चाटा। प्रीति जोर से उछल पड़ी। “भैया… क्या कर रहे हो… उफ्फ… शर्म आ रही है…”
लेकिन उसने अपनी जाँघें और फैला दीं। मैंने पूरा मुँह उसके योनि पर रख दिया। जीभ अंदर डाली, बाहर निकाली, क्लिटोरिस को चूसने लगा। प्रीति पागल हो रही थी। उसके हाथ मेरे बालों में थे। वो अपनी कमर ऊपर-नीचे कर रही थी। “और… और तेज… भैया… मैं… मैं कुछ हो रहा है…”
अचानक उसका पूरा बदन तन गया। योनि की दीवारें सिकुड़ने लगीं। गर्म रस मेरे मुँह में बह निकला। प्रीति पहली बार झड़ गई। वो काँप रही थी, सिसकारियाँ भर रही थी। मैंने तब तक चाटना जारी रखा जब तक वो शांत नहीं हो गई।
अब मैं उठकर उसके ऊपर आ गया। मेरा लिंग उसकी योनि पर टिका हुआ था। मैंने उसकी आँखों में देखा। “प्रीति… मैं अंदर आना चाहता हूँ।”
वो शरमाकर बोली, “धीरे से… पहली बार है… दर्द हो रहा था कल रात जब आपने कोशिश की थी…”
मैंने सिर हिलाया। लिंग की नोक को उसके छेद पर रगड़ा। गीला होने की वजह से आसानी हो रही थी। धीरे-धीरे दबाव डाला। इंच-इंच अंदर घुसता गया। प्रीति की आँखें बंद थीं। उसके नाखून मेरी पीठ में गड़ रहे थे। “आह… भैया… रुकिए… थोड़ा रुकिए…”
आधा घुसने पर मैं रुक गया। उसे चूमने लगा। होंठों को चूसता, जीभ अंदर डालता। धीरे-धीरे उसका शरीर ढीला पड़ने लगा। फिर मैंने बाकी का हिस्सा भी धीरे से अंदर कर दिया। पूरी तरह अंदर। उसकी योनि मेरे लिंग को कसकर जकड़े हुए थी। गर्म, नरम, चिपचिपी।
“पूरा… अंदर है ना?” उसने काँपती आवाज में पूछा।
“हाँ बेबी… पूरा,” मैंने उसके कान में कहा और धीरे-धीरे हिलने लगा।
शुरू में बहुत धीरे। बाहर निकालता, फिर अंदर। हर झटके के साथ प्रीति की सिसकारियाँ बढ़ती गईं। “जोर से… अब जोर से करो… दर्द कम हो गया है…”
मैंने रफ्तार बढ़ाई। अब कमरे में चप-चप… चप-चप की आवाज गूँज रही थी। उसके छोटे उरोज मेरी छाती से रगड़ खा रहे थे। मैंने उसकी एक टाँग कंधे पर रख दी और गहराई से चोदने लगा। प्रीति पागल हो गई थी। “भैया… और तेज… मारो मुझे… मैं तुम्हारी हूँ ना… पूरी तरह अपनी बना लो…”
मैंने उसकी दोनों टाँगें अपने कंधों पर रख दीं और पूरी ताकत से झटके मारने लगा। कमरे में चप-चप की आवाज़ तेज हो गई। उसकी योनि अब पूरी तरह खुल चुकी थी। हर झटके पर गर्म रस बाहर निकल रहा था। प्रीति दूसरी बार झड़ गई। उसके अंदर की दीवारें मेरे लिंग को दबा रही थीं।
मैं भी किनारे पर था। “प्रीति… मैं आने वाला हूँ…”
“अंदर डाल दो… सब अंदर… मेरे अंदर…” उसने कहा और मेरी पीठ पर नाखून गड़ा दिए।
आखिरी जोरदार झटकों के साथ मैं फूट पड़ा। गर्म-गर्म वीर्य की धार उसके गर्भाशय तक पहुँच रही थी। एक… दो… तीन… लंबी-लंबी फुहारें। मैं उसके ऊपर ढेर हो गया। हम दोनों पसीने से तर, साँसें फूल रही थीं।
काफी देर तक हम ऐसे ही लिपटे रहे। मेरा लिंग अभी भी उसके अंदर था, धीरे-धीरे ढीला पड़ रहा था। प्रीति मेरे बालों में उँगलियाँ फेर रही थी। “अमित भैया… मुझे डर भी लग रहा था… और मजा भी आ रहा था। अब हम क्या करेंगे?”
मैंने उसे चूमते हुए कहा, “हम अब एक-दूसरे के हैं। राकेश को कभी पता नहीं चलेगा। जब भी मौका मिलेगा, हम ऐसे ही साथ होंगे।”
वो मुस्कुराई और मेरे सीने पर सिर रख दिया। “मुझे अब भैया मत कहना… जब हम अकेले हों तो ‘जान’ कहना।”
हम दोनों कुछ देर बाद सो गए। मेरा लिंग अभी भी उसके अंदर था।
सुबह ग्यारह बजे मेरी आँख खुली। प्रीति अभी भी सो रही थी। उसका नंगा बदन चादर से आधा ढका हुआ था। उसके चेहरे पर संतोष की मुस्कान थी। मैंने उसे जगाया। “परीक्षा दस बजे से थी…”
वो चौंककर उठी, फिर मुस्कुराई, “कोई बात नहीं। कल जो हुआ… वो किसी परीक्षा से बढ़कर था।”
हम तैयार हुए। ट्रेन शाम को थी। मैंने कहा, “चलो, बनारस घूम आते हैं।”
रास्ते भर हम हाथ में हाथ डाले घूम रहे थे। हर छूने में कल रात की याद ताजा हो जाती। घाट पर बैठकर जब मैंने उसकी जाँघ पर हाथ रखा तो वो फुसफुसाई, “रात को ट्रेन में भी… कुछ कर सकते हैं ना?”
मेरी आँखों में शरारत चमक उठी।