कार्यालय की ऊँची इमारत में रात का सन्नाटा गहरा चुका था। बाईसवीं मंजिल पर स्थित विपणन विभाग के केबिन में केवल एक लैंप जल रहा था। जूही शर्मा अपनी कुर्सी पर झुकी हुई थी, कंप्यूटर की स्क्रीन पर आखिरी रिपोर्ट को जाँच रही थी। उसकी काली साड़ी की पल्लू कंधे से थोड़ी खिसक गई थी, और सफेद ब्लाउज के नीचे छिपे मुलायम शिखर हल्की साँस के साथ उठ-गिर रहे थे। उसने बालों को कान के पीछे किया और थकान भरी आँखें बंद कर लीं।
दरवाजे पर हल्की सी खटखट हुई। जूही ने सिर उठाया। अनुज मेहरा खड़े थे—कंपनी के वरिष्ठ प्रबंधक, लंबे कद, गहरे नेवले जैसे बाल, और आँखों में वह शांत तीव्रता जो हमेशा जूही को असहज कर देती थी। आज उनकी कमीज के ऊपरी बटन खुले हुए थे, और टाई ढीली थी।
“अभी तक यहाँ?” अनुज की आवाज धीमी थी, लगभग फुसफुसाहट जैसी। “मैंने सोचा था सब चले गए।”
जूही मुस्कुराई। “रिपोर्ट कल सुबह तक तैयार चाहिए। आप भी देर तक रुके हैं?”
अनुज अंदर आए और दरवाजा बंद कर दिया। कमरे में अचानक गर्मी बढ़ गई। उन्होंने जूही की कुर्सी के पास आकर खड़े हो गए। “तुम्हारी मेहनत देखकर लगता है कि तुम इस विभाग की असली आत्मा हो।” उनकी निगाह जूही के चेहरे से नीचे सरकती हुई उन दो मुलायम पहाड़ियों पर रुकी, जो साड़ी की चुस्त फिटिंग में साँस ले रही थीं। जूही ने महसूस किया कि उसकी त्वचा के नीचे कोई अदृश्य तार कसमसा रहा है।
“धन्यवाद, सर,” जूही ने कहा, आवाज थोड़ी कर्कश। उसने पानी की बोतल उठाई, लेकिन हाथ काँप गया। अनुज ने बोतल पकड़ ली और खुद एक घूँट पिया। उनके होंठ बोतल के मुँह पर लगे। जूही की नज़र उनके गले की मांसपेशियों पर ठहर गई।
“जूही,” अनुज ने धीरे से कहा, “कितने महीनों से हम साथ काम कर रहे हैं? तुम्हारी हर प्रस्तुति, हर विचार… कभी-कभी लगता है कि तुम मेरे दिमाग के अंदर बैठी हो।”
जूही ने कुर्सी घुमाई। उनके घुटने लगभग छू रहे थे। “मैं बस अपना काम करती हूँ।”
अनुज झुके। उनकी साँस जूही के कान के पास थी। “नहीं। तुम सिर्फ काम नहीं करतीं। तुम हर मीटिंग में उस तरह मुस्कुराती हो कि मेरा ध्यान भटक जाता है। तुम्हारे बाल जब खुलते हैं, तो लगता है कोई नदी बह रही है। और आज… आज तुम्हारी साड़ी की वह हल्की सी खुशबू…”
जूही की साँसें तेज हो गईं। उसने अनुज की आँखों में देखा। वहाँ केवल काम का तनाव नहीं था—वहाँ इच्छा की वह गहरी परत थी जो महीनों से दोनों के बीच अदृश्य दीवार की तरह खड़ी थी। जूही ने धीरे से हाथ बढ़ाया और अनुज की कमीज के खुले बटन पर उँगली फेर दी। “सर… यहाँ कैमरे हैं।”
“मैंने सुरक्षा को बता दिया है कि आज रात फ्लोर खाली है। कोई नहीं आएगा।” अनुज की आवाज में दृढ़ता थी। उन्होंने जूही का हाथ पकड़ा और अपनी हथेली पर रखा। “अगर तुम नहीं चाहतीं, तो मैं अभी चला जाऊँगा।”
जूही ने जवाब में अपना हाथ उनकी हथेली में दबाया। फिर धीरे से खड़ी हो गई। साड़ी की पल्लू फर्श पर गिर गई। ब्लाउज के नीचे छिपे दो गोल शिखर अनुज की छाती से मात्र इंच भर दूर थे। “मैं चाहती हूँ,” उसने फुसफुसाया।
अनुज ने जूही को कमर से पकड़ा। उनकी उँगलियाँ साड़ी की चिकनी सतह पर सरकती हुई पीछे की ओर गईं—वहाँ जहाँ मुलायम गोल पहाड़ियाँ एक दूसरे से सटकर बैठी थीं। उन्होंने धीरे से दबाया। जूही की साँस अटक गई। अनुज ने अपने होंठ जूही के गले पर रख दिए। जीभ की नोक से हल्की रेखा खींची। जूही ने आँखें बंद कर लीं और सिर पीछे झुकाया।
कमीज के बटनों को जूही ने एक-एक करके खोला। अनुज का सीना सामने आया—मजबूत, गर्म, और हल्के बालों से ढका। जूही ने अपने होंठ वहाँ रख दिए जहाँ दिल धड़क रहा था। अनुज की साँस भारी हो गई। उन्होंने जूही के ब्लाउज के हुक खोले। कपड़ा नीचे सरक गया। दो मुलायम शिखर मुक्त हो गए—गुलाबी शिखरों से सुशोभित, जो ठंडी हवा में थोड़े कठोर हो गए थे। अनुज ने दोनों हाथों से उन्हें सहारा दिया, हथेलियों से उनके भार को महसूस किया, और फिर मुँह झुकाकर एक शिखर को अपने होंठों में ले लिया। जीभ की नोक से गोल घेरा बनाया। जूही की कमर में कंपन दौड़ गया। उसने अनुज के बालों में उँगलियाँ फँसा लीं।
“अधिक…” जूही की आवाज टूटी हुई थी।
अनुज ने दूसरा शिखर भी उसी तरह चूमा, चूसा, और हल्के दाँतों से सहलाया। जूही की साड़ी की गांठ खुल गई। कपड़ा कमर से नीचे सरकते हुए फर्श पर गिर गया। अब केवल पेटीकोट और ब्रा बची थी—जो पहले ही खुल चुकी थी। अनुज ने जूही को टेबल की ओर धकेला। रिपोर्ट्स के कागजों के बीच जूही लेट गई। ठंडी लकड़ी उसकी पीठ पर लग रही थी, लेकिन गर्मी अंदर से फूट रही थी।
अनुज ने पेटीकोट को धीरे से ऊपर सरकाया। जूही की टाँगें थोड़ी खुलीं। अनुज की निगाह वहाँ ठहर गई जहाँ मुलायम पंखुड़ियों का गुप्त उद्यान छिपा था—हल्का नम, और इच्छा से थोड़ा खुलता हुआ। उन्होंने घुटनों के बल बैठकर दोनों हाथों से जूही की टाँगों को और फैलाया। फिर अपना मुँह उस गुप्त उद्यान के पास ले गए। गर्म साँस ने पंखुड़ियों को छुआ। जूही की कमर उछल गई। अनुज की जीभ ने धीरे से एक लंबी रेखा खींची—नीचे से ऊपर तक। पंखुड़ियाँ खुलने लगीं। जीभ अंदर घुसी, घूमी, चूसी। जूही ने मुट्ठी बाँध ली। आवाजें उसके गले से निकलने लगीं—अधूरी, काँपती हुई।
“अनुज… वहाँ… हाँ…”
अनुज ने अपनी एक उँगली को भी जोड़ लिया। धीरे-धीरे अंदर तक पहुँचाया, घुमाया, और जीभ से बाहरी कलियों को सहलाया। जूही की साँसें अब तेज थीं। उसके शरीर में लहरें उठ रही थीं। अनुज ने महसूस किया कि वह उद्यान और गीला हो रहा है, और जूही की टाँगें उनके कंधों पर कस रही हैं।
जब जूही लगभग शिखर पर पहुँचने वाली थी, अनुज ने रुककर खड़े हो गए। उन्होंने अपनी पैंट का बटन खोला। नीचे से एक कठोर दंड बाहर आया—गर्म, स्पंदित, और इच्छा से भरा हुआ। जूही की आँखें चौड़ी हो गईं। उसने हाथ बढ़ाकर उसे छुआ। उँगलियाँ उसकी लंबाई पर फिसलीं, ऊपर के गोल शिखर को सहलाया। अनुज की साँस भारी हो गई। जूही ने उसे अपने मुँह के पास लाया और होंठों से धीरे से चूमा। जीभ की नोक से गोल घेरा बनाया, फिर धीरे-धीरे अंदर लिया। अनुज ने जूही के बाल पकड़ लिए। जूही ने गहराई तक पहुँचाया, फिर बाहर निकाला, फिर से अंदर। लार की चमक उसके कठोर दंड पर चमक रही थी।
“जूही… पर्याप्त…” अनुज ने धीरे से कहा और जूही को फिर से टेबल पर लिटा दिया। उन्होंने जूही की टाँगों को अपने कंधों पर रखा। कठोर दंड को उस गीले उद्यान के द्वार पर टिकाया। धीरे से धकेला। पंखुड़ियाँ खुलती गईं, और वह अंदर समाता चला गया—गहरा, पूरा। जूही की आँखें बंद हो गईं। एक लंबी साँस बाहर निकली। अनुज रुके, दोनों को एक-दूसरे की धड़कन महसूस करने दी, फिर धीरे-धीरे बाहर निकाले और फिर अंदर धकेले।
ताल तेज होती गई। टेबल की लकड़ी हल्की आवाज करने लगी। जूही के मुलायम शिखर ऊपर-नीचे हो रहे थे। अनुज ने एक हाथ से उन्हें सहलाया, निचोड़ा, और दूसरे हाथ से जूही की कमर को पकड़े रखा। हर धक्के के साथ जूही की आवाज ऊँची होती गई। अनुज ने जूही को पलट दिया। अब जूही पेट के बल लेटी थी, हाथ टेबल के किनारे पकड़े हुए। अनुज ने पीछे से उसके मुलायम गोल पहाड़ियों को दोनों हाथों से फैलाया और फिर से अंदर प्रवेश किया। इस कोण से गहराई और बढ़ गई। जूही की आवाजें अब दबी हुई चीखों में बदल रही थीं।
अनुज ने जूही के बालों को पकड़कर सिर पीछे खींचा। उनके होंठ जूही के कान के पास थे। “तुम कितनी गर्म हो… अंदर कितनी तंग…” जूही ने जवाब में अपनी गोल पहाड़ियों को और पीछे धकेला। ताल और तेज हो गई। अनुज की एक उँगली जूही के गुप्त उद्यान की बाहरी कली पर घूमने लगी। जूही का शरीर अचानक कड़ा हो गया। लहरें उसके अंदर से फूटीं—लंबी, तीव्र, और बार-बार आने वाली। अनुज ने महसूस किया कि वह उद्यान और कस रहा है, और फिर खुद भी शिखर पर पहुँचे। गर्म धारा अंदर तक पहुँची। दोनों कुछ क्षणों तक वैसे ही रहे—साँसें भारी, शरीर जुड़ा हुआ।
धीरे-धीरे अनुज बाहर निकले। जूही को उन्होंने गोद में उठाया और अपनी कुर्सी पर बैठा लिया। जूही उनके सीने से सट गई। दोनों की त्वचा पसीने से चमक रही थी। अनुज ने जूही के बालों में उँगलियाँ फेरते हुए कहा, “यह सिर्फ एक रात नहीं होगी।”
जूही ने सिर उठाया। आँखों में मुस्कान थी। “मैं जानती हूँ। कल सुबह जब ऑफिस खुलेगा, हम फिर से प्रोफेशनल बन जाएँगे। लेकिन रातें… रातें हमारी रहेंगी।”
अनुज ने जूही के माथे पर चूम लिया। कमरे में लैंप अभी भी जल रहा था। बाहर शहर की रोशनियाँ झिलमिला रही थीं। दोनों ने कुछ देर और एक-दूसरे को सहलाया—मुलायम शिखर, कठोर दंड जो फिर से उठने लगा था, गीला उद्यान जो अभी भी स्पंदित था, और गोल पहाड़ियाँ जो हर स्पर्श पर काँप रही थीं।
दूसरी बार और धीमी थी। अनुज ने जूही को अपनी गोद में बैठाया। जूही ने खुद को उस कठोर दंड पर बैठाया—धीरे-धीरे, पूरी तरह। दोनों ने एक-दूसरे की आँखों में देखा। जूही ऊपर-नीचे होने लगी। अनुज के हाथ उसके मुलायम शिखरों पर थे, निचोड़ रहे थे, सहला रहे थे। जूही ने अनुज के गले में दाँत गड़ा दिए। ताल फिर से बढ़ी। इस बार जब लहरें आईं, तो दोनों एक साथ शिखर पर पहुँचे। जूही अनुज के कंधे पर झुक गई। शरीर काँप रहा था।
रात और गहरी हो गई। उन्होंने पानी पिया, फिर से छुआ, चूमा। अनुज ने जूही को खिड़की के पास ले जाकर खड़ा किया। शहर नीचे फैला था। जूही ने हाथ शीशे पर रख दिए। अनुज पीछे से आए। कठोर दंड फिर से उस उद्यान में समा गया। इस बार धक्के लंबे और गहरे थे। जूही की साँसें शीशे पर धुंध बना रही थीं। अनुज के हाथ जूही के मुलायम शिखरों को पकड़े हुए थे, और हर धक्के के साथ वे और कसते जा रहे थे। जूही की गोल पहाड़ियाँ अनुज की जाँघों से टकरा रही थीं। आवाजें अब दबी नहीं थीं—वे कमरे में गूँज रही थीं।
जब तीसरी बार शिखर आया, तो जूही के घुटने कमजोर पड़ गए। अनुज ने उसे संभाल लिया। दोनों फर्श पर बैठ गए। साँसें धीमी होने लगीं। जूही ने अनुज के सीने पर सिर रखा। “मैं कभी नहीं सोचती थी कि ऑफिस की यह कुर्सी… यह टेबल… इतनी यादगार हो जाएँगी।”
अनुज मुस्कुराए। “अब हर रिपोर्ट लिखते समय तुम्हें याद आएगा।”
जूही हँसी। हँसी में थकान और संतुष्टि दोनों थे। उन्होंने कपड़े पहने—धीरे-धीरे, एक-दूसरे की मदद से। ब्लाउज के हुक अनुज ने लगाए। साड़ी की पल्लू जूही ने खुद सँभाली। अनुज की टाई जूही ने बाँधी। दरवाजा खोलने से पहले दोनों ने एक लंबा चुंबन लिया—गहरा, मीठा, और वादे से भरा।
जूही ने लैंप बंद किया। अँधेरे में अनुज का हाथ उसके हाथ में था। वे लिफ्ट की ओर चले। लिफ्ट में फिर से चुंबन हुआ—जल्दी का, लेकिन तीव्र। जब ग्राउंड फ्लोर पहुँचे, तो दोनों अलग हो गए। सुरक्षा गार्ड ने नमस्ते किया। बाहर रात की हवा ठंडी थी।
जूही ने टैक्सी पकड़ी। पीछे मुड़कर देखा—अनुज खड़े थे, हाथ जेब में, मुस्कुरा रहे थे। जूही ने भी मुस्कुराया। टैक्सी चल दी। रास्ते में जूही ने अपनी त्वचा पर बचे निशानों को महसूस किया—गले पर हल्के दाँत के निशान, जाँघों पर उँगलियों के निशान, और अंदर वह गर्म अनुभूति जो अभी भी बनी हुई थी।
अगली सुबह ऑफिस में जूही अपनी कुर्सी पर बैठी थी। अनुज मीटिंग में आए। उनकी निगाहें मिलीं। कोई शब्द नहीं बोला गया। लेकिन जब अनुज ने रिपोर्ट पास की, तो उनकी उँगली जूही की उँगली से छू गई—एक सेकंड के लिए। जूही की साँस अटक गई। अनुज मुस्कुराए और आगे बढ़ गए।
रात फिर आएगी। ऑफिस फिर खाली होगा। और तब मुलायम शिखर, कठोर दंड, गीला उद्यान और गोल पहाड़ियाँ फिर से एक-दूसरे से मिलेंगी—बिना किसी शब्द के, केवल इच्छा की भाषा में।
जूही ने कंप्यूटर चालू किया। स्क्रीन पर नई रिपोर्ट खुल गई। लेकिन उसकी नज़र बार-बार उस टेबल पर जा रही थी जहाँ पिछली रात सब कुछ बदला था। उसने धीरे से मुस्कुराया। काम जारी रखा। लेकिन मन में वह कहानी लिख रही थी—जो कभी कागजों पर नहीं उतरेगी, केवल शरीर की यादों में रहेगी।
शाम ढली। ज्यादातर लोग चले गए। जूही अपनी कुर्सी पर बैठी रही। दरवाजे पर फिर खटखट हुई। अनुज अंदर आए। इस बार कोई सवाल नहीं पूछा। जूही खड़ी हो गई। अनुज ने दरवाजा बंद किया। लैंप जल रहा था। और कहानी फिर से शुरू हुई—और भी गहरी, और भी तीव्र, और भी बिना शब्दों की।
मुलायम शिखर फिर से मुक्त हुए। कठोर दंड फिर से जागा। गीला उद्यान फिर से खुला। गोल पहाड़ियाँ फिर से सहलाई गईं। और ऑफिस की दीवारें फिर से उन आवाजों को सुनती रहीं जो केवल इच्छा समझती हैं।
रात लंबी थी। दोनों थकने का नाम नहीं ले रहे थे। हर स्पर्श नया था, हर धक्का गहरा था, हर शिखर ऊँचा था। जब आखिरकार वे रुके, तो फर्श पर लेटे हुए थे, एक-दूसरे से लिपटे। बाहर भोर होने वाली थी।
जूही ने फुसफुसाया, “कल फिर?”
अनुज ने जवाब में उसे और पास खींच लिया। “जब तक यह ऑफिस खड़ा है।”
और इस तरह कार्यालय की वह रात एक कहानी बन गई—जो कभी किसी फाइल में दर्ज नहीं होगी, लेकिन दोनों के शरीर की हर कोशिका में हमेशा रहेगी।