अनछुई आग: भाग 2

आरव की उंगली पैंटी के किनारे पर रुकी हुई थी। नेहा की सांसें अब पूरी तरह अनियंत्रित हो चुकी थीं। कमरे में बारिश की आवाज अब भी आ रही थी, लेकिन दोनों के कान में सिर्फ अपने दिल की धड़कन गूंज रही थी। नेहा की आंखें अभी भी बंद थीं, लेकिन उसके चेहरे पर एक अनजानी उत्तेजना और शर्म का मिश्रण साफ दिख रहा था।

आरव ने बहुत धीरे से, लगभग चुपके से पैंटी का कपड़ा नीचे खींचना शुरू किया। कपड़ा नेहा की जांघों पर रगड़ता हुआ सरकता गया। जब पैंटी पूरी तरह उतर गई तो नेहा ने अपने मांसल नितंब हल्के से ऊपर उठाकर मदद की। अब वो पूरी तरह नंगी लेटी थी। उसके रेशमी घास का हल्का-सा जंगल आरव की नजरों के ठीक सामने था – नरम, काले, और थोड़े-थोड़े नम।

आरव ने एक पल रुककर सिर्फ देखा। उसकी सांस अटक गई। “नेहा… तुम… इतनी खूबसूरत हो कि मैं बोल नहीं पा रहा,” उसकी आवाज कांप रही थी। उसने अपनी उंगलियों को बहुत धीरे से रेशमी घास पर रखा। नेहा का शरीर हल्का-सा सिहर गया। आरव ने उन्हें सहलाया – जैसे कोई कीमती चीज को छू रहा हो। रेशमी घास के नीचे छिपी हुई रस भरी कली पहले से ही गीली हो चुकी थी।

“तुम्हें… अच्छा लग रहा है?” आरव ने फुसफुसाकर पूछा।

नेहा ने आंखें खोलीं। उसके गाल लाल थे। “बहुत… लेकिन डर भी लग रहा है। ये सब… पहली बार है ना।”

आरव ने मुस्कुराकर सिर हिलाया। “मुझे भी। लेकिन मैं तुम्हें कभी दर्द नहीं दूंगा। वादा है।”

उसने अपनी उंगलियों को और नीचे सरकाया। रस भरी कली की कोमल पंखुड़ियां अब स्पष्ट महसूस हो रही थीं। वो गर्म, नरम और रस से भीगी हुई थीं। आरव ने एक उंगली से बहुत हल्के से ऊपर से नीचे तक सहलाया। नेहा का पूरा शरीर एक झटके से तन गया। उसके मुंह से एक लंबी, गहरी आह निकली – “आह्ह… आरव…”

आरव ने रुककर उसे देखा। “दर्द तो नहीं हो रहा?”

“नहीं… बस… एक अजीब-सा सुख… जैसे बिजली दौड़ गई हो,” नेहा ने शर्माते हुए कहा।

आरव ने हिम्मत करके अपनी जीभ को रस भरी कली के पास ले जाया। पहले तो सिर्फ हल्की-सी सांस से उसे छुआ। नेहा की जांघें अनायास ही थोड़ी-सी फैल गईं। फिर आरव ने अपनी जीभ से बहुत धीरे-धीरे उसकी कोमल पंखुड़ियों को चाटा। मीठा, नम रस उसकी जीभ पर फैल गया। नेहा की उंगलियां चादर को कसकर पकड़ रही थीं। उसकी कमर खुद-ब-खुद हल्का-हल्का ऊपर उठ रही थी।

“आरव… वहां… और… धीरे…” नेहा की आवाज में अब शर्म कम और चाहत ज्यादा थी।

आरव ने अपनी जीभ को और गहराई में घुमाया। वो रस भरी कली की हर पंखुड़ी को चूम रहा था, कभी हल्का-सा चूस रहा था, कभी सिर्फ सहला रहा था। नेहा की सांसें अब छोटी-छोटी और तेज हो चुकी थीं। उसके सुडौल उरोज हर सांस के साथ ऊपर-नीचे हो रहे थे। आरव ने एक हाथ ऊपर बढ़ाकर एक कोमल पहाड़ी को फिर से थाम लिया। उंगलियों से उसकी उन्नत चोटी को हल्का-सा दबाते हुए नीचे अपनी जीभ की गति जारी रखी।

नेहा का पूरा शरीर अब एक लय में हिल रहा था। “कुछ… कुछ हो रहा है आरव… मैं… मैं रुक नहीं पा रही…” उसकी आवाज में रोने जैसा स्वर था, लेकिन वो सुख का रोना था।

आरव ने सिर उठाया। उसके होंठ नेहा के रस से चमक रहे थे। उसने नेहा की आंखों में देखा। “मैं जानता हूं… तुम्हें पहली बार ये महसूस हो रहा होगा। मैं और धीरे कर सकता हूं।”

नेहा ने अपना सिर हिलाया। “नहीं… मत रुको… बस… मुझे और महसूस कराओ।”

आरव ने अब अपनी उंगली को बहुत धीरे से रस भरी कली के द्वार पर रखा। पहले सिर्फ बाहर से घुमाया। फिर बहुत हल्के से अंदर सरकाने की कोशिश की। नेहा की मधुर गुफा संकुचित थी, लेकिन रस से इतनी भीगी हुई थी कि उंगली आसानी से थोड़ा-सा अंदर चली गई। नेहा ने एक लंबी सांस रोकी।

“ठीक है?” आरव ने तुरंत पूछा।

“हां… बस… थोड़ा अजीब… लेकिन अच्छा…” नेहा ने आंखें बंद करके कहा।

आरव ने उंगली को बहुत धीरे-धीरे अंदर-बाहर करना शुरू किया। साथ ही अपनी जीभ से रस भरी कली की ऊपरी नोक को चूमता रहा। नेहा अब पूरी तरह खो चुकी थी। उसके मांसल नितंब बिस्तर पर दबे हुए थे, लेकिन हर बार जब आरव की उंगली अंदर जाती, वो हल्का-सा ऊपर उठ जाते। उसकी सांसें कराह में बदल चुकी थीं।

“आरव… मुझे… लग रहा है… मैं… उड़ जाऊंगी…” नेहा ने कराहते हुए कहा।

आरव ने अपनी गति थोड़ी बढ़ाई, लेकिन फिर भी बहुत सावधानी से। नेहा का शरीर अचानक तन गया। उसकी जांघें कांपने लगीं। एक लंबी, तेज आह के साथ नेहा का पहला चरम सुख आ गया। उसकी मधुर गुफा आरव की उंगली के चारों तरफ सिकुड़ गई। रस की एक हल्की-सी लहर निकली। नेहा के पूरे शरीर में लहरें दौड़ रही थीं। वो कुछ पल तक कांपती रही, फिर ढीली पड़ गई।

आरव ने सिर उठाकर नेहा को देखा। नेहा की आंखें आधी बंद थीं। उसके चेहरे पर एक अनोखी चमक थी। आरव ने उसके माथे पर प्यार से किस किया।

“तुम… बहुत सुंदर लग रही हो अभी,” उसने फुसफुसाया।

नेहा ने धीरे से आंखें खोलीं। उसकी नजर आरव के कठोर शिश्न पर पड़ी, जो अब पूरी तरह तना हुआ और गर्म था। नेहा ने शर्म से मुंह दूसरी तरफ मोड़ लिया, लेकिन फिर आरव की तरफ देखकर हल्के से बोली, “अब… तुम्हारी बारी… लेकिन… बहुत धीरे… मैं… डर रही हूं।”

आरव ने अपना कठोर शिश्न नेहा की जांघों के बीच रख दिया। वो अभी सिर्फ छू रहा था। रस भरी कली की गर्मी उसे महसूस हो रही थी।

“मैं बहुत धीरे करूंगा… वादा है,” आरव ने कहा और नेहा का चेहरा दोनों हाथों से थाम लिया। उनकी नजरें मिलीं।

आरव ने अपना कठोर शिश्न रस भरी कली के द्वार पर हल्का-सा दबाया…

भाग 2 समाप्त।

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