अनछुई आग: भाग 3

आरव का कठोर शिश्न नेहा की रस भरी कली के द्वार पर ठहरा हुआ था। बस छू रहा था। गर्म, सख्त, और थोड़ा-थोड़ा नब्ज की तरह धड़कता हुआ। नेहा की सांसें रुक-रुककर आ रही थीं। उसकी आंखें आधी बंद थीं, लेकिन उसकी पलकें कांप रही थीं। कमरे में बारिश अब और तेज हो गई थी, जैसे बाहर की दुनिया भी उनके इस पल को और गहरा बनाना चाहती हो।

आरव ने नेहा का चेहरा दोनों हाथों में थामा। उसकी उंगलियां नेहा के गालों पर हल्के-हल्के सहलाती रहीं। “नेहा… मैं अभी भी रुक सकता हूं। एक शब्द कहो और मैं पीछे हट जाऊंगा। तुम्हें कोई दर्द नहीं चाहिए, कोई जल्दबाजी नहीं।”

नेहा ने अपनी आंखें पूरी तरह खोलीं। उनमें डर था, लेकिन उससे कहीं ज्यादा प्यार और विश्वास था। उसने आरव के होंठों को अपनी उंगलियों से छुआ और बहुत धीमी, कांपती हुई आवाज में बोली, “नहीं… मैं चाहती हूं। बस… बहुत-बहुत धीरे। मुझे महसूस कराते रहो… हर पल।”

आरव ने सिर हिलाया। उसकी आंखों में भी वही भावना थी – प्यार, सम्मान, और एक गहरी चाहत। उसने अपना कठोर शिश्न थोड़ा और आगे बढ़ाया। सिर्फ सिर का हिस्सा। रस भरी कली की कोमल पंखुड़ियां धीरे-धीरे अलग होती गईं। नेहा का पूरा शरीर एक हल्के से झटके से तन गया। उसकी उंगलियां आरव की पीठ पर कस गईं।

“आह…” नेहा के मुंह से एक छोटी-सी कराह निकली। दर्द नहीं था, लेकिन एक अनजानी तनाव था – जैसे कोई नया द्वार खुल रहा हो।

आरव तुरंत रुक गया। उसने नेहा की आंखों में देखा। “दर्द हो रहा है?”

“थोड़ा… लेकिन अच्छा भी लग रहा है,” नेहा ने शर्माते हुए फुसफुसाया। “मत रुको… बस रुक-रुककर करो।”

आरव ने नेहा के माथे पर प्यार से किस किया। फिर उसके सुडौल उरोज की तरफ झुका। एक कोमल पहाड़ी को मुंह में ले लिया। जीभ से उसकी उन्नत चोटी को बहुत धीरे-धीरे चूमने लगा। नेहा की सांसें फिर से सामान्य होने लगीं। आरव ने इसी बीच अपना कठोर शिश्न और थोड़ा आगे सरकाया। अब आधा हिस्सा अंदर था। मधुर गुफा की गर्मी और रस उसे पूरी तरह लपेट रहा था।

नेहा की जांघें अनायास ही थोड़ी और फैल गईं। उसके मांसल नितंब बिस्तर पर दबे हुए थे, लेकिन हर छोटे-छोटे धक्के के साथ वो हल्का-हल्का ऊपर उठ जाते। “आरव… मैं… तुम्हें अंदर महसूस कर रही हूं… पूरा… गहरा…” उसकी आवाज में अब दर्द के साथ एक मीठी लहर थी।

आरव ने रुककर उसे चूम लिया। लंबा, गहरा किस। उनकी जीभें एक-दूसरे में घुल गईं। किस के बीच में ही उसने अपना कठोर शिश्न और आगे बढ़ाया। अब पूरा का पूरा अंदर था। दोनों एक पल के लिए बिल्कुल स्थिर हो गए। नेहा की मधुर गुफा उसके कठोर शिश्न को कसकर जकड़े हुए थी। दोनों के शरीर एक-दूसरे से पूरी तरह चिपके हुए थे।

“तुम… बहुत गर्म और तंग हो,” आरव ने नेहा के कान में फुसफुसाकर कहा। उसकी आवाज में सम्मान था, जैसे वो किसी पवित्र जगह में खड़ा हो। “मैं तुम्हारे अंदर… पूरा… महसूस कर रहा हूं।”

नेहा ने अपनी आंखें बंद कर लीं। उसके हाथ आरव की पीठ पर घूम रहे थे। “मुझे भी… लग रहा है जैसे… हम एक हो गए हों। धीरे-धीरे हिलाओ… मुझे पूरा महसूस कराओ।”

आरव ने बहुत-बहुत धीरे से अपनी कमर हिलाई। बस एक इंच। फिर रुक गया। फिर फिर से। हर बार रस भरी कली की गहराई में जाना, फिर बाहर आना। नेहा की सांसें अब लंबी और गहरी हो चुकी थीं। हर धक्के के साथ उसके सुडौल उरोज आरव के सीने से रगड़ खा रहे थे। कोमल पहाड़ियां नरम और गर्म थीं। आरव ने एक हाथ बढ़ाकर उन्हें सहलाया – उंगलियों से उनकी गोलाई को नापता, चोटियों को हल्का-हल्का दबाता।

नेहा की कराहें अब और मीठी हो गई थीं। “और… गहरा… लेकिन धीरे…” वो बार-बार फुसफुसा रही थी।

आरव ने गति बढ़ाई, लेकिन सिर्फ थोड़ी। अब वो पूरी तरह स्लो, गहरे और लयबद्ध धक्के दे रहा था। हर बार जब वो अंदर जाता, नेहा की मधुर गुफा उसे और भी गीला और गर्म कर देती। रस की हल्की-हल्की आवाज कमरे में भर रही थी – बहुत धीमी, लेकिन दोनों के लिए बेहद उत्तेजक। नेहा के मांसल नितंब अब आरव की हथेलियों में थे। वो उन्हें हल्का-हल्का दबाता, उन्हें ऊपर की तरफ सहारा देता ताकि गहराई और बढ़ जाए।

दोनों के शरीर पसीने से चिपक चुके थे। आरव ने नेहा की गर्दन पर किस किया, फिर कानों में, फिर फिर से होंठों पर। हर किस के साथ उसका कठोर शिश्न अंदर-बाहर होता रहा। नेहा की उंगलियां अब उसकी पीठ पर हल्की-हल्की खरोंच छोड़ रही थीं।

“आरव… मैं… फिर से… वही महसूस कर रही हूं… लेकिन अब और गहरा…” नेहा की आवाज कांप रही थी। उसकी आंखों के कोनों में सुख के आंसू थे।

आरव ने अपनी गति और भी धीमी कर दी। वो जानबूझकर रुक-रुककर कर रहा था ताकि नेहा हर पल को पूरा-पूरा महसूस करे। कभी वो पूरी तरह अंदर घुस जाता, फिर लंबी देर तक रुक जाता। नेहा की मधुर गुफा उसके चारों तरफ सिकुड़ती, फिर ढीली पड़ती।

“मैं तुम्हें कभी नहीं भूलूंगा… ये पल… तुम्हारी ये गर्मी…” आरव ने उसके कान में कहा।

नेहा ने उसे और कसकर जकड़ लिया। उसके मांसल नितंब अब आरव की कमर के इर्द-गिर्द लिपट गए थे। दोनों एक-दूसरे में पूरी तरह घुलते जा रहे थे। समय जैसे रुक गया था। बाहर बारिश, अंदर सिर्फ उनकी सांसें, कराहें और शरीर की गर्माहट।

आरव ने फिर से बहुत धीरे से एक लंबा, गहरा धक्का दिया। नेहा का पूरा शरीर लहरा उठा…

भाग 3 समाप्त

अनछुई आग: भाग 4