आरव का कठोर शिश्न नेहा की मधुर गुफा के सबसे गहरे कोने तक पहुंच चुका था। किस अभी भी टूटा नहीं था। दोनों के होंठ एक-दूसरे में ऐसे घुले हुए थे जैसे वो एक ही सांस बन गए हों। नेहा की आंखों से सुख के आंसू बह रहे थे, लेकिन वो आंसू दर्द के नहीं, बल्कि उस अनहद खुशी के थे जो पहली बार किसी को पूरी तरह अपना बनाने से आती है।
आरव ने किस तोड़ा तो सिर्फ इतना फुसफुसाया, “नेहा… मैं तुम्हें रोकना नहीं चाहता… जितना समय लगे, उतना… लेकिन मैं तुम्हें पूरा-पूरा चरम तक ले जाना चाहता हूं।” उसकी आवाज में प्यार था, धैर्य था, और एक गहरी जिम्मेदारी थी।
नेहा ने अपनी आंखें खोलीं। उनमें अब शर्म नहीं, सिर्फ भरोसा और चाहत थी। उसने आरव की पीठ पर हाथ फेरते हुए कहा, “मुझे भी… वही चाहिए… लेकिन बहुत धीरे… हर पल को महसूस करते हुए… जैसे समय रुक गया हो।”
आरव ने मुस्कुराकर सिर हिलाया। उसने अपनी कमर को फिर से हिलाना शुरू किया – लेकिन अब भी उतनी ही स्लो गति से। हर धक्का लंबा, गहरा और सोचा-समझा था। कठोर शिश्न मधुर गुफा की दीवारों को छूता हुआ पूरा अंदर जाता, फिर लंबी देर तक रुक जाता, फिर धीरे-धीरे बाहर निकलता। बाहर निकलते वक्त रस भरी कली की कोमल पंखुड़ियां उसके कठोर शिश्न को चूमती हुईं महसूस होतीं। रस अब दोनों के बीच में हल्की-सी चिपचिपी आवाज कर रहा था – बहुत धीमी, लेकिन इतनी उत्तेजक कि दोनों की सांसें और गहरी हो जातीं।
नेहा की जांघें आरव की कमर के चारों तरफ कसकर लिपटी हुई थीं। उसके मांसल नितंब हर धक्के पर ऊपर उठते और आरव को और गहराई में खींच लेते। वो महसूस कर रही थी कि उसकी मधुर गुफा अब और भी गीली, और भी गर्म हो चुकी है। रेशमी घास पूरी तरह भीगकर चिपक गई थी। हर बार जब आरव अंदर जाता, नेहा की कमर खुद-ब-खुद ऊपर उठ जाती।
“आरव… वहां… ठीक वहीं… हां…” नेहा की कराह अब बहुत मीठी और लंबी हो गई थी। उसकी उंगलियां आरव की पीठ पर घूम रही थीं, कभी-कभी हल्की-हल्की खरोंच छोड़ देतीं। उसके सुडौल उरोज आरव के सीने से बार-बार रगड़ खा रहे थे। कोमल पहाड़ियां गर्म और नरम थीं, उनकी उन्नत चोटियां सख्त हो चुकी थीं।
आरव ने एक हाथ नीचे सरकाकर नेहा के मांसल नितंब को थाम लिया। हथेली पूरी तरह भर गई। वो उन्हें हल्का-हल्का दबाता, ऊपर की तरफ सहारा देता ताकि गहराई और बढ़ जाए। दूसरा हाथ नेहा के एक उरोज पर था – उंगलियों से कोमल पहाड़ी को नापता, चोटी को हल्का-हल्का घुमाता और कभी-कभी मुंह झुकाकर चूस लेता।
नेहा का पूरा शरीर अब एक लय में हिल रहा था। उसकी सांसें छोटी-छोटी और तेज हो चुकी थीं। “आरव… कुछ… बहुत बड़ा… आ रहा है… लेकिन… ये रुक नहीं रहा… लगातार… बढ़ रहा है…” उसकी आवाज कांप रही थी।
आरव ने अपनी गति बिल्कुल नहीं बढ़ाई। वो जानबूझकर स्लो रखे हुए था। हर धक्के के बाद लंबा रुकना, फिर फिर से अंदर जाना। कभी-कभी वो पूरी तरह अंदर घुसकर रुक जाता और बस वहीं हल्का-हल्का घुमाता। नेहा की मधुर गुफा उसके चारों तरफ सिकुड़ती, फिर ढीली पड़ती। रस अब और ज्यादा बह रहा था।
“मैं तुम्हें महसूस कर रहा हूं… हर सिकुड़न… हर गर्मी…” आरव ने नेहा के कान में फुसफुसाया। “तुम्हारी मधुर गुफा मुझे अंदर खींच रही है… जैसे वो मुझे कभी छोड़ना ही न चाहती हो।”
नेहा ने आरव को और कसकर जकड़ लिया। उसके मांसल नितंब अब आरव की कमर को पूरी तरह घेर चुके थे। “आरव… मैं… मैं पहुंच रही हूं… लेकिन… तुम भी… साथ… आओ ना…” उसकी आंखें अब पूरी तरह बंद थीं। उसके चेहरे पर एक अनोखी चमक थी।
आरव ने नेहा के होंठों को फिर से चूम लिया। किस गहरा, लंबा और भूखा था। उसी किस के बीच उसने अपनी गति थोड़ी और गहरी कर दी – लेकिन अभी भी बहुत स्लो। हर धक्का अब नेहा की मधुर गुफा के सबसे संवेदनशील स्थान को छू रहा था।
नेहा का शरीर अचानक पूरी तरह तन गया। उसकी जांघें कांपने लगीं। मांसल नितंब आरव की हथेली में सिकुड़ गए। “आरव… मैं… आ गई… आ गई…” उसकी आवाज एक लंबी कराह में बदल गई। मधुर गुफा आरव के कठोर शिश्न के चारों तरफ जोर-जोर से सिकुड़ी। रस की एक गर्म लहर बाहर निकली। नेहा का पूरा शरीर लहरों की तरह उठता-गिरता रहा। वो कुछ पल तक कांपती रही, फिर धीरे-धीरे ढीली पड़ गई।
आरव ने नेहा को पूरी तरह थाम रखा था। वो अभी भी अंदर था। उसने नेहा की आंखों में देखा। “मैं भी… बहुत पास हूं… लेकिन तुम्हारे साथ… साथ ही…”
नेहा ने कांपती उंगलियों से आरव का चेहरा थामा। “अंदर… आ जाओ… मुझे पूरा महसूस कराओ…”
आरव ने आखिरी कुछ धक्के बहुत धीरे-धीरे दिए। फिर उसका पूरा शरीर तन गया। कठोर शिश्न मधुर गुफा के अंदर गहराई तक सिकुड़ा। गर्म रस की लहर नेहा के अंदर छूट गई। दोनों एक साथ कराह उठे। आरव नेहा के ऊपर ढेर हो गया, लेकिन अपना वजन उस पर नहीं डाला। दोनों के शरीर एक-दूसरे से चिपके हुए थे।
काफी देर तक दोनों ऐसे ही लेटे रहे। सांसें धीरे-धीरे सामान्य होती गईं। आरव ने नेहा के बालों में उंगलियां फेरते हुए उसके माथे पर किस किया। “तुम… बहुत बहादुर हो… और बहुत खूबसूरत।”
नेहा ने शर्म से मुस्कुराकर आरव के सीने से सटकर कहा, “और तुम… बहुत प्यार करने वाले। ये पल… मैं कभी नहीं भूलूंगी।”
बारिश अब रुक चुकी थी। कमरे में सिर्फ उनकी सांसों की गर्मी और एक-दूसरे की धड़कनें बची थीं। रेशमी घास, मधुर गुफा, सुडौल उरोज, मांसल नितंब – सब अब आराम से लेटे हुए थे। लेकिन दोनों जानते थे कि ये अनछुई आग अभी सिर्फ शुरू हुई थी।
कहानी समाप्त