Dost ke Behan Ke Sath Sex: गर्मी जैसे नरक की आग थी। इलाहाबाद स्टेशन से उतरकर हम दोनों घंटों से होटल ढूंढ रहे थे। मेरे सबसे अच्छे दोस्त राकेश की छोटी बहन प्रीति, जो अभी-अभी अठारह साल की हुई थी, जीव विज्ञान में स्नातक की प्रवेश परीक्षा देने आई थी। राकेश खुद दिल्ली में था, इसलिए उसने मुझे फोन करके कहा था, “यार अमित, प्रीति को अकेले मत छोड़ना। तू इलाहाबाद में है, प्लीज उसके साथ रहना।”
मेरा नाम अमित है। राजनीति शास्त्र में एमए करके मैं इलाहाबाद में प्रशासनिक सेवाओं की तैयारी कर रहा था। दिन भर की थकान, पसीने से भीगे कपड़े और जानलेवा गर्मी ने दोनों को बेहरम कर रखा था।
प्रीति का चेहरा लाल हो रहा था। उसकी हल्की साँवली त्वचा पर पसीने की बूँदें चमक रही थीं। वो सफेद सलवार-कमीज पहने थी जिसका दुपट्टा अब उसके कंधे से सरककर बाँह पर लटक रहा था। उसकी कमीज के ऊपर के दो बटन खुले हुए थे और उसकी छोटी-छोटी, नन्ही उभरी हुई छातियाँ हल्की-हल्की साँसों के साथ ऊपर-नीचे हो रही थीं।
“अमित भैया, अब बस… मुझसे नहीं चला जा रहा,” उसने थककर कहा। उसकी आवाज में रोने जैसी कातरता थी।
मैंने चार-पाँच होटल देख लिए थे, सब भरे हुए या महंगे। आखिरकार एक पुराना, घटिया सा होटल मिला — नाम था “शांति निवास”। बाहर से ही दीवारें फटी हुईं, सीढ़ियाँ टूटी हुईं। अंदर घुसते ही पसीने और सड़े हुए गीले कपड़ों की बदबू आई। मैनेजर ने बताया कि सिर्फ एक सिंगल बेड वाला कमरा खाली है। मैंने अतिरिक्त गद्दा माँगा तो उसने एक फटा-पुराना कंबल फेंक दिया। Dost ke Behan Ke Sath Sex
कमरा नंबर 107। अंदर घुसते ही प्रीति बेड पर ढेर हो गई। मैंने दरवाजा बंद किया और बोला, “तुम थक गई हो। चलो पहले कुछ खा लें। इस गंदे होटल में खाना खाने का मन नहीं है।”
हम पास के एक सस्ते रेस्टोरेंट में गए। गरम चावल, दाल और सब्जी। प्रीति चुपचाप खा रही थी। उसकी आँखें थकान से बंद हो रही थीं। वापस होटल आकर मैंने कहा, “तुम बेड पर सो जाओ, मैं नीचे कंबल पर लेट जाता हूँ।”
वो सहमति में सिर हिलाकर लेट गई। मैंने पंखा तेज कर दिया, लेकिन वो भी ठंडी हवा देने की बजाय सिर्फ गर्म हवा उड़ा रहा था। लाइट बंद की और मैं कंबल पर लेट गया।
रात के करीब दो बजे मुझे पेशाब लगा। अंधेरे में उठा, बत्ती जलाई। और जैसे ही रोशनी हुई, मेरा दिल धड़ककर रह गया।
प्रीति घोड़े बेचकर सो रही थी। इतनी गर्मी कि उसने चादर तक नहीं ओढ़ी थी। उसकी सलवार की नाड़ी ढीली हो चुकी थी और सलवार जाँघों तक खिसक गई थी। कमीज ऊपर चढ़ी हुई थी, पेट की नाभि साफ दिख रही थी। उसकी जाँघें — हल्की साँवली, चिकनी, युवा — ट्यूबलाइट की सफेद रोशनी में चमक रही थीं। जैसे चाँदनी में केले के तने। अभी एक महीने पहले ही वो अठारह की हुई थी। शरीर अभी पूरी तरह विकसित नहीं हुआ था, लेकिन जहाँ-जहाँ हुआ था, वो बेहद आकर्षक था।
मैं कुछ देर तक खड़ा-खड़ा देखता रहा। मेरा मन राजनीति शास्त्र की किताबों और मस्तराम की कहानियों के बीच घूमने लगा। मैंने कभी असली लड़की को इस तरह नहीं देखा था। लेकिन आज… मेरे सबसे अच्छे दोस्त की छोटी बहन… जो मुझे “भैया” कहती थी…
अचानक ग्लानि हुई। “ये क्या सोच रहा हूँ मैं?” मैंने खुद को झिड़का और बाथरूम चला गया। वापस आया तो सोचा सलवार ठीक कर दूँ, लेकिन डर लगा कि अगर जग गई तो क्या सोचेगी। मैंने बत्ती बुझाई और कंबल पर लेट गया।
लेकिन नींद कहाँ?
अँधेरे में उसकी साँसों की आवाज आ रही थी। उसके शरीर की हल्की महक — पसीने, साबुन और युवा लड़की की — कमरे में भर गई थी। इंटरनेट पर पढ़ी दोस्त की बहन वाली कहानियाँ याद आने लगीं। कामदेव ने मानो मेरे सीने पर बाण छोड़ दिए।
एक घंटा बीता। मैं उठ बैठा। बत्ती जलाई।
अब प्रीति करवट बदल चुकी थी। उसकी सलवार और ऊपर खिसक गई थी। नीली पैंटी का किनारा साफ दिख रहा था। उसकी जाँघें थोड़ी फैली हुईं। उरोज — संतरे से थोड़े छोटे, लेकिन नुकीले — कमीज से दबे हुए थे। मेरा लिंग पजामे में तंबू बना चुका था।
मैं बेड के पास गया। दिल जोरों से धड़क रहा था। बहुत धीरे से मैंने उसकी सलवार को और ऊपर खींचा। फिर बत्ती बुझाई, आँखें अंधेरे के अभ्यस्त होने दीं और फिर बत्ती जलाई।
दृश्य देखकर मेरा मुंह सूख गया। पैंटी के अंदर “डबल रोटी” जैसा उभार साफ था। गर्म रेत का टीला। हल्के बालों की रेखा पैंटी के किनारे से झाँक रही थी। मैं स्तब्ध खड़ा रहा।
फिर मैंने बत्ती बुझाई। अंधेरे में बेड के पास गया और बहुत धीरे से अपनी एक उँगली उसकी जाँघ पर रखी। कोई हरकत नहीं। फिर पूरा हाथ रख दिया। नरम, गर्म, चिकनी त्वचा। मेरी हिम्मत बढ़ी। हाथ ऊपर सरकाया और पैंटी के ऊपर रख दिया। हल्का दबाव दिया।
अचानक प्रीति करवट बदली। मैं डरकर नीचे लेट गया। वो उठी, बत्ती जलाई। मैं आँखें बंद किए पड़ा रहा। वो बाथरूम गई। वापस आई तो ट्यूबलाइट के पास खड़ी होकर कुछ देर खड़ी रही। मेरी आँखें बंद थीं, लेकिन रोशनी की तीव्रता से लगा कि वो मेरी तरफ देख रही है — खासकर मेरे पजामे के तंबू की तरफ।
फिर उसने लाइट बंद की और लेट गई।
मेरी हिम्मत बढ़ गई। मैंने हस्तमैथुन शुरू कर दिया। कुछ ही मिनटों में वीर्य फर्श पर गिरा। गंदे कंबल से पोंछा और सो गया।
सुबह जब उठा तो प्रीति बाथरूम में थी। कपड़े धोने की आवाज आ रही थी। बाथरूम का पुराना दरवाजा नीचे से फटा हुआ था। मैं फर्श पर लेट गया और सुराख से झाँका।
प्रीति पूरी तरह नंगी थी। उसकी पीठ, कमर, और गोल-गोल नितंब मेरी तरफ थे। दो अधपके खरबूजे जैसे नितंब। वो झुकी हुई कपड़े धो रही थी। फिर खड़ी हुई, मुड़ी और बैठकर जाँघों पर साबुन लगाने लगी।
उसकी टाँगें फैलीं।
पहली बार मैंने असली योनि देखी। हल्के बालों से ढकी, सूजी हुई, बीच में पतली दरार। जैसे हिमालय पर काली बर्फ और सूखी नदी। मेरी साँस रुक गई। लिंग फिर खड़ा हो गया। Dost ke Behan Ke Sath Sex
वो साबुन लगाकर खड़ी हो गई। मैं और देख नहीं पाया।
उस दिन उसका पहला पेपर था। मैं उसे परीक्षा हॉल छोड़कर वापस होटल आया। दूसरे पेपर कल था। शाम को खाना खाने गए। वापस आकर मैंने कहा, “प्रीति, कल रात कंबल पर नींद नहीं आई। बहुत चुभता है।”
वो बोली, “अमित भैया, आप बेड पर सो जाइए, मैं नीचे सो जाती हूँ।”
मैंने इनकार किया। फिर उसने खुद सुझाव दिया, “चलो, हम दोनों बेड पर ही सो जाते हैं। सिंगल बेड है, लेकिन एडजस्ट हो जाएंगे।”
मेरी योजना कामयाब हो गई।