अनछुई आग: भाग 1

बारिश शुरू हुए तो जैसे आसमान ने भी उन दोनों की धड़कनों को सुन लिया हो। नेहा और आरव कॉलेज से निकलकर बस स्टॉप पर खड़े थे। आज का दिन कुछ अलग था। क्लास के बाद दोनों ने काफी देर तक कैंटीन में बैठकर बातें की थीं – पढ़ाई, भविष्य, और वो छोटी-छोटी बातें जो दो साल की दोस्ती में छुपी रह जाती हैं। लेकिन आज नजरों में कुछ और था। कुछ ऐसा जो दोनों ने पहले कभी नाम नहीं दिया था।

“मेरे घर चलें?” नेहा ने अचानक कहा था, अपनी आवाज को जितना सामान्य रखने की कोशिश की, उतना ही वो कांप रही थी। “मम्मी-पापा दो दिन के लिए गांव गए हैं। घर खाली है। बारिश में भीगने से बेहतर है कि चाय पी लें।”

आरव ने एक पल उसे देखा। उसकी आंखों में वही पुरानी मुस्कान थी, लेकिन आज उसमें एक नई गर्माहट थी। “ठीक है… अगर तुम्हें कोई दिक्कत न हो तो।”

बस में बैठते वक्त दोनों के बीच सिर्फ सन्नाटा था। नेहा खिड़की की तरफ देख रही थी, बारिश की बूंदें शीशे पर गिर रही थीं। आरव उसकी तरफ देख रहा था, लेकिन बोल नहीं रहा था। उसके मन में सैकड़ों सवाल घूम रहे थे – क्या नेहा सच में सिर्फ चाय पीने के लिए बुला रही है? या वो भी वही महसूस कर रही है जो वो पिछले कई महीनों से महसूस कर रहा है?

नेहा का घर पुराने कॉलोनी में था – दो मंजिला, छोटा सा लेकिन बहुत प्यारा। उसके कमरे की खिड़की सड़क की तरफ थी। दरवाजा खोलते ही नेहा ने हल्के से मुस्कुराकर कहा, “ये मेरा कमरा है। आओ, अंदर आ जाओ।”

कमरा साधारण था। एक सिंगल बेड, स्टडी टेबल पर किताबें बिखरी हुईं, दीवार पर दोनों की एक पुरानी सेल्फी चिपकी हुई थी जिसमें वो दोनों हंस रहे थे। टेबल लैंप जलाकर नेहा ने कहा, “तुम बैठो, मैं चाय बनाती हूं।”

लेकिन चाय बनी ही नहीं।

आरव बिस्तर के किनारे बैठ गया। नेहा उसके पास आई और खड़ी हो गई। दोनों के बीच कुछ पल का सन्नाटा छा गया। फिर नेहा ने धीरे से पूछा, “आरव… तुम्हें कभी… ऐसा लगा है कि दोस्ती से आगे कुछ होना चाहिए?”

आरव ने उसकी आंखों में देखा। उसकी आवाज बहुत धीमी थी, “लगा है नेहा। बहुत बार। लेकिन डर लगता था कि तुम्हारी दोस्ती खो न जाए।”

नेहा ने शर्म से नीचे देख लिया। उसके गाल लाल हो गए थे। “मुझे भी… आज जब तुमने कहा कि तुम्हें मेरे साथ समय बिताना अच्छा लगता है, तो मैंने सोचा… आज ट्राई कर ही लेते हैं।”

आरव ने उसका हाथ पकड़ा। उंगलियां मिलते ही दोनों को एक हल्की-सी बिजली-सी लगी। नेहा धीरे से उसके पास बैठ गई। पहले तो बस हाथ थामे रहे। फिर आरव ने बहुत धीरे से उसका चेहरा अपनी तरफ घुमाया। उनकी नजरें मिलीं। नेहा की सांसें थोड़ी तेज हो गई थीं।

“मैं तुम्हें छूना चाहता हूं… बहुत धीरे-धीरे,” आरव ने फुसफुसाया। “अगर तुम नहीं चाहती तो बस बोल दो।”

नेहा ने जवाब में कुछ नहीं कहा। बस अपनी आंखें बंद कर लीं और सिर हल्का-सा आगे झुका दिया।

आरव ने पहले उनके होंठों को छुआ। बहुत नरम, बहुत धीमा किस। जैसे कोई फूल खिल रहा हो। नेहा के होंठ कांप रहे थे। किस गहरा होता गया। उनकी जीभें पहली बार मिलीं – नम, गर्म, और थोड़ी-थोड़ी कांपती हुई। नेहा के मुंह से हल्की-सी “हम्म…” निकली। आरव ने एक हाथ उसके गाल पर रखा, दूसरे हाथ से उसकी कमर को हल्का-सा सहलाया।

काफी देर तक वो बस किस करते रहे। समय जैसे रुक गया था। बाहर बारिश की आवाज और अंदर सिर्फ उनकी सांसों की गर्मी।

फिर आरव ने बहुत धीरे से नेहा की चोली के ऊपर वाले बटन को छुआ। नेहा सिहर गई, लेकिन पीछे नहीं हटी। आरव ने एक-एक करके बटन खोले। चोली का कपड़ा सरकते ही उसके सुडौल उरोज का ऊपरी हिस्सा दिखने लगा। गोरा, नरम, और सांसों के साथ हल्का-हल्का हिलता हुआ।

आरव ने एक पल रुककर सिर्फ देखा। “नेहा… तुम्हारे सुडौल उरोज… इतने खूबसूरत हैं,” उसकी आवाज में सम्मान था, चाहत थी।

नेहा ने शर्म से मुंह दूसरी तरफ मोड़ लिया, लेकिन उसने आरव का हाथ पकड़कर अपने एक उरोज पर रख दिया। आरव की हथेली पूरी तरह भर गई। कोमल पहाड़ी जैसा नरम, गर्म, और बहुत संवेदनशील। उसने हल्का-सा दबाया। नेहा की आंखें बंद हो गईं। उसके मुंह से एक गहरी सांस निकली।

आरव ने दूसरे उरोज को भी चोली से आजाद किया। अब दोनों कोमल पहाड़ियां उसके सामने थीं। वो उन्हें दोनों हाथों में थामे रहा, बहुत धीरे-धीरे सहलाता रहा। उंगलियों से उनकी गोलाई को महसूस करता रहा। फिर उसने सिर झुकाया और एक चोटी को होंठों से छुआ। जीभ से हल्का-सा चूमा। नेहा का पूरा शरीर तन गया। उसकी उंगलियां आरव के बालों में फंस गईं।

“आरव… बहुत अच्छा लग रहा है…” नेहा ने आंखें बंद करके फुसफुसाया। उसकी आवाज में शर्म थी, लेकिन चाहत भी थी।

आरव ने दोनों कोमल पहाड़ियों को बारी-बारी चूमा, सहलाया, हल्का-हल्का दबाया। नेहा की सांसें अब और तेज हो चुकी थीं। उसके गाल लाल थे। कमरे में सिर्फ बारिश की आवाज और उनकी धड़कनों की गूंज थी।

बहुत देर बाद आरव ने सिर उठाया। नेहा की आंखें अभी भी बंद थीं। उसने धीरे से नेहा की सलवार के नाडे पर हाथ रखा। नेहा ने हल्का-सा सिर हिलाया – हां।

आरव ने नाडा खोला। सलवार धीरे-धीरे फिसलकर नीचे चली गई। अब नेहा सिर्फ हल्की-सी सफेद पैंटी में थी। उसके मांसल नितंब बिस्तर पर नरम ढंग से दबे हुए थे। पैंटी के ऊपर से रेशमी घास की हल्की-सी उभरी हुई आकृति दिख रही थी।

आरव नेहा को बिस्तर पर आराम से लिटा दिया। वो उसके ऊपर झुका। उनकी नजरें फिर मिलीं।

“अभी भी मैं रुक सकता हूं… अगर तुम्हें डर लग रहा हो,” आरव ने बहुत प्यार से कहा।

नेहा ने उसका चेहरा दोनों हाथों से थामा। उसकी आंखों में आंसू नहीं थे, बस गहरी भावनाएं थीं। “नहीं आरव… मैं चाहती हूं। लेकिन… बहुत धीरे करना। ये हमारी पहली बार है।”

आरव ने मुस्कुराकर उसकी पैंटी के किनारे पर उंगली रख दी। रेशमी घास के नीचे छिपी हुई रस भरी कली अब बस छूने भर की दूरी पर थी…

भाग 1 समाप्त

और कहानी पढ़े।

अनछुई आग: भाग 2